अध्यात्म क्या है (What is spirituality)

आध्यात्मिक जाग्रति के लिए सर्वप्रथम अध्यात्म को जानना और समझना आवश्यक है। अध्यात्म का संबंध किसी धर्म विशेष से नहीं होता है बल्कि इसके अनुभव और अनुभूति के लिए हमें इसे धर्म की सीमाओं से परे जाकर समझना होता है। अध्यात्म का सरल शब्दों मे अर्थ है आत्म अध्ययन  अर्थात स्वंय को जानना तात्पर्य यह कि जब हम हमारे भौतिक रूप से परे जाकर अभौतिक मूल रूप को जानने का प्रयास करते है तब अध्यात्म को जानने का आरंभ  होता है हमने परमात्मा की इस सृष्टि में जन्म लिया और जैसे जैसे बुद्धि का विकास हुआ हमने विश्व में अपनी बुद्धि के बल पर  नई दुनियायें बनाई, देश दुनिया, प्रदेश दुनिया, शहर की दुनिया, गांव की दुनिया, परिवार की दुनिया मतलब प्रत्येक क्षेत्र में आपको एक अलग नई दुनिया मिल जायेगी हमने अपने लोभ लालच के वशीभूत होकर अपने आसपास अलग-अलग दुनियाओं का बडा ओर जटिल जाल बुन रखा है । इस प्रकार ईश्वर की दुनिया में जन्म लेकर उसके पश्चात मृत्यु तक अपनी बनाई अनगिणत दुनियाओं में ही हम भ्रमण करतें रहतें है और जीवन भर अपने लिए विभिन्न साधन जुटाने की कवायद में लगे रहते है ओर इसी चक्र में घुमते हुए जीवन का अंत हो जाता है। यहाँ पर आप देखेंगे कि जन्म से लेकर मृत्यु तक जो भी विकास किया गया हमारे आस-पास बना हुआ जाल जिसमें परिवार, रिश्ते, मित्र अन्य हमारे द्वारा ही बनाए गए है इसमें ईश्वर का कोई हाथ नहीं है यह हमारी ही रचना है जिस रचना में हम पूरे जीवन भर फंसे हुए रहते है यदि आपको अध्यात्म का अनुभव करना है और उसे जानना है तो आपको अपनी बनाई हुई रचना अर्थात अपनी बनाई हुई दुनिया से परे जाकर उस लोक में प्रवेश करना है जहाँ आपका कुछ नहीं है सब कुछ ईश्वर द्वारा निर्मित है उस लोक में केवल आपको जानना और अनुभव करना है ।

अध्यात्म का अर्थ  सरल शब्दों में समझा जाये तो यह है कि जो कुछ भी हमने बनाया है उससे परे जाकर जो है वह अध्यात्म है अर्थात एक ऐसा ज्ञान जो आपको व्यवहारिक दुनिया में प्राप्त नहीं हो सकता है, व्यवहारिक जीवन में कोई भी ज्ञान यदि आपको प्राप्त करना है तो जहां आप है, उससे आगे की ओर बढना पडता है परन्तु आध्यमिक ज्ञान के लिए आपको पीछे की ओर लौटना होता है ओर वहां तक जाना होता है जब आपका जन्म हुआ था, उस समय आपका वही रूप था जो ईश्वर द्वारा प्रदान किया था उसके पष्चात आपके शरीर के विकास के साथ आपने भिन्न भिन्न रूपों को धारण किया ओर उन रूपों में गुम होते चले गये जब आप पीछे लोटनें की या़त्रा आरंभ करतें तो बुद्वि के साथ उत्पन्न अनेकानेक विकार नष्ट होते चले जाते हैं ओर बडी सुन्दर बात यह है कि जन्म के समय हमारी बुद्वि विकसित नहीं थी इसलिये उस समय हम ईश्वर के अध्यात्म का कोई भी ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम नहींथे परन्तु आज पूर्ण विकसित बुद्वि के साथ जब हम उस शुद्ध निर्दोष अवस्था तक पहुंचते है तो हमें विकारों के परे जो ज्ञान है वह स्वतः ही प्राप्त होने लगता है, अध्यात्म ईश्वर का ज्ञान है प्रकृति का ज्ञान है ईश्वर द्वारा की गई सृष्टि की रचना के रहस्य का ज्ञान है, हमारे अपने वास्तविक रूप का ज्ञान है ओर यह ज्ञान किताबों में लिपिबद्व नहीं किया जा सकता है हमें अपने मुक्त शुद्ध मन की अवस्था में व्यक्तिगत अनुभव ओर आतंरिक अनुभूति से ही प्राप्त हो सकता है, गुरू से आपको आध्यात्मिक यात्रा के मार्ग का ज्ञान हो सकता है उस मार्ग पर चलना आपकी सामर्थ पर निर्भर करता हैं, अध्यात्म को जानने का एकमात्र मार्ग ध्यान है ।अध्यात्म के ज्ञान के लिए जहां आप हो वहां से पीछे लोटने का मार्ग केवल ध्यान है, ध्यान ही ऐसा मार्ग जिसके माध्यम से आप अपने भिन्न भिन्न रूपों से कुछ समय के लिये मुक्त हो सकते हो, जब आप ध्यान कि गहराईयों में उस अवस्था तक पहुचते जहाँ आपके जीवन में जो कुछ भी आपने एकत्र किया है, अच्छा या बुरा आप ध्यान की अवस्था में उससे अलग हो जाते और विचारों  का  आवागमन मस्त्ष्कि में रूक जाता है अर्थात आप एक शून्य की अवस्था में पहुच जाते है जहाँ आप अपने कर्म संग्रह और यहाँ तक कि शरीर को भी भूल जाते है तब उस जिस परम अवस्था को आप अनुभव करते है उसे आत्मोप्लब्धि कहते है। ध्यान की उपरोक्त परम् अवस्था में पहुच जाने के पश्चात गहन शांति का अनुभव स्वतः ही होने लगता है और जहाँ हम सारा जीवन जिस चक्रव्यूह में फंसे रहते है उस चक्रव्यूह से निकलने का ज्ञान और अनुभव हमें होने लगता है जो कि अत्यंत सुखद होता है । जब हम अपनी चेतना शक्ति को ध्यान की अवस्था में किसी एक बिंदु पर केंद्रित करते है तब हमारी चेतना बुद्वि के नए आयामो को स्पर्श करती है, तब भौतिकता से परे जो ज्ञान प्राप्त होता है उसका स्वतः ही अनुभव आपको होने लगता है। यह ज्ञान ही अध्यात्म को अनुभव करने का माध्यम है।

आध्यात्मिक जाग्रतिकर्ता शैलेन्द्र     शिव शक्ति अध्यात्म पीठ इन्दौर                       

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